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भारत - चीन विवाद (भाग-2)

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पैंगोंग झील संघर्ष English हम सबसे पहले समाचार पत्रों में प्रकाशित एक समाचार को देखते हैं जिसमें एक "चित्र 1" के माध्यम से "पैंगोंग झील" के उत्तरी किनारे पर "फिंगर 4" से लेकर "फिंगर 8" के बीच की स्थिति को समझने का प्रयास किया है।  चित्र 1 इस "चित्र 1" में हरि रेखा के जरिए, नियंत्रण रेखा (LAC) को दिखाने का प्रयास किया गया है, तथा झील के पास यह रेखा "फिंगर 8" से पास करती है और यहां तक भारतीय क्षेत्र के होने की बात कहीं है, तथा यह समझाने का प्रयास किया गया है की चीनी सेना "फिंगर 8" से घुसकर भारत की सीमा में "फिंगर 4" तक पहुंच गई है तथा "फिंगर 8" से "फिंगर 4" के बीच के "भारतीय हिस्से" पर कब्जा करके बैठी है। सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारियों के आधार पर हम यह समझने का प्रयास करेंगे, कि क्या  लेख में जो बताया गया हैं वही पूरी तरह से ठीक है? और क्या वाकई में चीन की सेना "भारतीय क्षेत्र" में घुसी हुई है? अथवा इस तरह की खबरें मात्र कोरी कल्पनाएं ही है। तथ्यों को

भारत - चीन विवाद (भाग-1)

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि 

English

सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध जानकारियों से ऐसा प्रतीत होता है की अपनी उत्पत्ति के साथ ही वर्तमान पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना ने अपनी विस्तार वादी नीतियों का अनुसरण शुरू कर दिया था इसकी शुरुआत चीन द्वारा बलपूर्वक तिब्बत को अपने कब्जे में लेने से हुई।

चीन द्वारा बलपूर्वक तिब्बत की सामरिक रूप से कमजोर सरकार और व्यवस्था पर अपना कब्जा करने के बाद भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों में अपना वर्चस्व स्थापित करने की प्रक्रिया 1962 के भारत चीन युद्ध से काफी पहले हो चुकी थी।

तत्कालिन भारत सरकार द्वारा चीन के साथ सर्वप्रथम राजनयिक संबंधों की स्थापना होने के बाद और तिब्बत के ऊपर चीनी दावे को भारत की तरफ से स्वीकृति मिलने के बाद चीन की विस्तार वादी नीतियों के तहत, चीन द्वारा भारत की सीमाओं के अतिक्रमण का दौर शुरू हुआ।

इसका उदाहरण चीन द्वारा उसके महत्वकांक्षी राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना "G219" (see the red-line in the map) के तहत बनाए गए हाईवे में झलकती है, जो राजमार्ग अक्साई चीन से पास करता है।

NHG219
NH-G219

ऐतिहासिक तथ्यों पर अगर नजर डालें तो यह पता चलता है कि भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों के नजदीक से गुजरने वाले इस राष्ट्रीय राजमार्ग का निर्माण चीन द्वारा लद्दाख के क्षेत्र में तभी कर लिया था जब लद्दाख भारत के हिस्से में था। जिसे बाद में 1962 के युद्ध में चीन ने अपने कब्जे में ले लिया और आज हम चीन के कब्जे वाले लद्दाख को अक्साई चीन के नाम से जानते हैं।

हैरानी की बात यह है की 1958 तक भारत की सरकार को इस अपने क्षेत्र से गुजरने वाले चीनी राष्ट्रीय राजमार्ग की जानकारी भी नहीं थी।

इससे स्पष्ट होता है कि चीन ने तिब्बत पर अपना कब्जा करने के बाद भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों में लगातार धीरे-धीरे अतिक्रमण करना शुरू कर दिया था।

भारत के सत्तासीन लोगों के द्वारा चीन के प्रति अत्यंत उदार, मित्रता पूर्ण और सामरिक रूप से कमजोर तिब्बत की, भारत सरकार के द्वारा उपेक्षा और उचित हस्तक्षेप ना करने के कारण चीन द्वारा बलपूर्वक तिब्बत को हथियाने में चीनी सरकार की मदद हुई।

तिब्बत पर चीनी कब्जे को मान्यता देना एक ऐतिहासिक भूल और एक आत्मघाती फैसला साबित हुआ।

इस संदर्भ में 1954 में डॉक्टर भीमराव अंबेडकर द्वारा कहां गया यह कथन सत्य और न्याय उचित मालूम पड़ता है:
                  "by allowing Chinese to take possession of Lhasa, the prime minister ( Pandit Jawaharlal Nehru ) practically helped them bringing their borders down to Indian border....... aggression might well be committed by people who are always in habit of committing aggression"
                         -Dr Bhimrao Ambedkar.

इतना ही नहीं भारत की तत्कालीन सरकार द्वारा अपने सीमावर्ती क्षेत्रों की रक्षा के लिए पर्याप्त एवं उचित कदम ना उठाना और उन सीमाओं की रक्षा के लिए चाइना की दया अथवा दोस्ती पर निर्भर रहना वर्तमान परिस्थितियों के लिए एक प्रमुख कारण मालूम पड़ते हैं।

तत्कालिक सरकार द्वारा भारत की सीमाओं के प्रति उनके उत्तरदायित्व को निभाने के स्थान पर, चीन के प्रति मित्रता, UN में ताइवान के स्थान पर चीन को सदस्य बनाए जाने पर, तिब्बत पर चीनी अधिकार को मान्यता देने पर तथा "हिंदी चीनी भाई भाई" का गायन करने पर विशेष ध्यान दिया गया।

जिसके परिणाम स्वरूप 1962 की लड़ाई में चीन ने अपनी साम्राज्यवादी नीतियों के तहत भारत के एक बहुत बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया, जिसे हम आज अक्साई चीन के नाम से जानते हैं, यही नहीं भारत की आजादी से लेकर 1962 में चीन से मिली हार तक और उसके बाद काफी लंबे समय तक सीमावर्ती क्षेत्रों पर उचित एवं आवश्यक ध्यान अथवा विकास कार्यों और निर्माण कार्यों का ना हो पाना इस क्षेत्र की होने वाली उपेक्षा को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।

जहां दूसरी तरफ चीन ने अपने सीमावर्ती क्षेत्रों पर भारी भरकम इंफ्रास्ट्रक्चर जिसमें नेशनल हाईवे प्रोजेक्ट भी शामिल थे, को पूरा करने मैं लगा हुआ था।
वही भारत सरकार की तरफ से इस तरह की कोई स्पष्ट नीति नहीं थी।
उदासीनता और उपेक्षा का आलम यह था कि, भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने संसद, चीन के द्वारा अवैध रूप से भारतीय जमीन पर कब्जा किए जाने के बारे में संसद में कहा :-
              "but never the less the fact remains that area is most extra ordinary area in the world as far as terrain is concerned at that rate no tree grows anywhere in this wide area there may be some shrubs"
                    - Pandit Jawaharlal Nehru.

जिस पर श्री महावीर त्यागी ने अपने गंजे सिर की ओर इशारा करते हुए टिप्पणी की : -
              "no hair grows on my head does it means that the head has no value?"

पंडित जवाहरलाल नेहरू का यह कथन उनकी भारतीय सीमाओं पर चीन द्वारा की गई गतिविधियों के प्रति उनकी मंशा और भारतीय सीमाओं की सुरक्षा के प्रति उनके उदासीन और उपेक्षित रवैया को दर्शाने के लिए शायद पर्याप्त हैं। और शायद जो 1962 में, भारत की पराजय के कारणों को समझने के लिए उपयुक्त माध्यम हो सकता है।

शासन का काम देश में न्याय और व्यवस्था को स्थापित करना होता है ना कि अपनी व्यक्तिगत मित्रता और रिश्तेदारों को निभाने के लिए देश के हितों को न्योछावर या उपेक्षित करना होता है लेकिन वर्तमान संदर्भ में ऐसा ही प्रतीत होता है।

Ostrich Approach अपना कर हम अपने देश की सीमाओं की रक्षा नहीं कर सकते।

भारतीय सीमाओं पर वर्तमान संकट के बीज बहुत पुराने समय से मौजूद है। यदि समय रहते इसका समाधान नहीं निकाला गया तो यह एक विकराल वृक्ष की तरह बढ़ता ही चला जाएगा।

पिछली कुछ और वर्तमान सरकार की तरफ से इस ओर ध्यान देना शुरू किया गया है लेकिन यह विकास कार्य ही विस्तार वादी चीन की आंखों की किरकिरी बने हुए हैं यह ध्यान देने योग्य बात है कि इन्हीं सीमावर्ती क्षेत्रों में चाइना ने अपनी तरफ भारी निर्माण किए हैं इसके बावजूद भारत द्वारा अपनी सीमा के अंदर किए जा रहे निर्माण कार्यों को बाधित करने का उसके द्वारा लगातार प्रयास किया जा रहा है लेकिन वर्तमान सरकार और हमारी सशक्त सेनाओं द्वारा कूटनीतिक और सामरिक माध्यमों से दृढ़ता से चीन का जवाब दिया जा रहा है।
जैसा कि गलवान वैली में 15 जून 2020 को तथा पैंगोंग लेक के क्षेत्र में 5 मई 2020 को जवाब दिया गया।
सीमा पर वर्तमान परिस्थितियां जटिल है, इन परिस्थितियों को राजनीतिक विरोध के लिए अथवा अपने निजी स्वार्थ को साधने के लिए इस्तेमाल किए जाने की प्रवृत्ति समस्या को और गंभीर बना रही है।

इस दौरान भारत चीन सीमा पर लगातार घटित हो रही घटनाओं में से, दो महत्वपूर्ण  घटनाओं को समझने की कोशिश करेंगे और सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध जानकारियों का विश्लेषण करके हम सत्य जानने, भ्रम और भ्रामक स्थिति को खत्म करने का प्रयास करेंगे।

मेरा यह व्यक्तिगत मत है, कि किसी व्यक्ति विशेष को किसी राजनैतिक  महत्वाकांक्षा अथवा निजी स्वार्थ के वशीभूत होकर देश के अंदर देश की सेनाओं और देश के हितों के खिलाफ कोई भी भ्रामक प्रचार से बचना चाहिए।

लेकिन यह प्रचारित करने की कोशिश हो रही है, की चाइना की पीपल्स लिबरेशन आर्मी ने हमारे देश में घुसकर हमारी जमीन पर कब्जा कर लिया है तो उन महानुभावों से यह पूछना जरूरी है कि, "यह कब्जा, जिसके बारे में आप दावा रहे हैं किस तारीख को और किस स्थान पर किया गया है"।

5 मई 2020 और 15 जून 2020 को भारत चीन सीमा पर जो कुछ हुआ हम आगे उसको समझने की कोशिश करेंगे।

                                                                                                                ... अगले लेख में

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