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भारत - चीन विवाद (भाग-2)

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पैंगोंग झील संघर्ष English हम सबसे पहले समाचार पत्रों में प्रकाशित एक समाचार को देखते हैं जिसमें एक "चित्र 1" के माध्यम से "पैंगोंग झील" के उत्तरी किनारे पर "फिंगर 4" से लेकर "फिंगर 8" के बीच की स्थिति को समझने का प्रयास किया है।  चित्र 1 इस "चित्र 1" में हरि रेखा के जरिए, नियंत्रण रेखा (LAC) को दिखाने का प्रयास किया गया है, तथा झील के पास यह रेखा "फिंगर 8" से पास करती है और यहां तक भारतीय क्षेत्र के होने की बात कहीं है, तथा यह समझाने का प्रयास किया गया है की चीनी सेना "फिंगर 8" से घुसकर भारत की सीमा में "फिंगर 4" तक पहुंच गई है तथा "फिंगर 8" से "फिंगर 4" के बीच के "भारतीय हिस्से" पर कब्जा करके बैठी है। सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारियों के आधार पर हम यह समझने का प्रयास करेंगे, कि क्या  लेख में जो बताया गया हैं वही पूरी तरह से ठीक है? और क्या वाकई में चीन की सेना "भारतीय क्षेत्र" में घुसी हुई है? अथवा इस तरह की खबरें मात्र कोरी कल्पनाएं ही है। तथ्यों को

भारत - चीन विवाद (भाग-3)

गलवान वैली संघर्ष

चीन को अपना मित्र मान लेने से वह हमारा मित्र नहीं हो सकता, वह मित्रता करने योग्य भी नहीं है हमें उसे एक धूर्त और कुटिल पड़ोसी की तरह देखना चाहिए। 

एक ऐसा देश जो विस्तार वादी मानसिकता से ग्रस्त है। जो यूएन व यूएनएससी में पाकिस्तानी आतंकवाद, और कश्मीर के मुद्दे पर हमारा विरोध करता है। जो देश, भारत विरोधी सभी ताकतों को समर्थन देता है, जो देश भारत के समस्त पड़ोसियों को, भारत के खिलाफ भड़काता हो, और जिसने हमारे बहुत बड़े भूभाग पर बहुत लंबे समय से कब्जा कर रखा हो, यदि ऐसे पड़ोसी देश को हम मित्र समझेंगे, तो हमें शत्रुओं की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

पिछली लगभग सभी सरकारों द्वारा, चीन की समस्त दुसाहसिक गतिविधियों पर आंखें मूंद लेने (ostrich approach) अथवा उसके प्रति मित्रता स्थापित करने की अत्यधिक लालसा का ही यह परिणाम है, कि आज हमें अपनी सीमाओं पर इस कपटी पड़ोसी की आक्रामकता का शिकार होना पड़ रहा है।

चीन से मित्रता की लालसा पालने की बजाए यदि वर्तमान और पिछली सरकारों ने, समय रहते अपने समस्त सीमावर्ती क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया होता और अपनी सैन्य क्षमताओं को ज्यादा मजबूत बनाने का प्रयास किया होता, तो शायद चीन इस तरह हमें आंखें दिखाने का प्रयास ना करता।

हमें यह स्पष्ट रूप से समझ लेना ही पड़ेगा कि, चीन ऐसा पड़ोसी नहीं है जिसके लिए हम "हिंदी चीनी भाई भाई का गायन" करें अथवा उसे "साबरमती के किनारे झूला झुलाए"।

वर्तमान सरकार ने अपने शुरुआती दिनों में स्पष्ट रूप से चीन के प्रति मैत्री और सौहार्दपूर्ण संबंधों की लालसा दिखाते हुए प्रयास भी किए, लेकिन उसका परिणाम हमें डोकलाम 2017 और 2020 के गलवान वैली संघर्ष के रूप में देखने को मिला। 

लेकिन वर्तमान सरकार ने वर्तमान संघर्ष की स्थिति में कठोर और आक्रामक प्रतिक्रिया दे कर निश्चित तौर पर एक सराहनीय और प्रशंसनीय कार्य किया है। 

किसी भी युद्ध के परिणाम को पहले से ही निश्चित मानना यह एक तकनीकी और नैतिक भूल ही होगी, परंतु इस बात के लिए वर्तमान नेतृत्व बधाई का पात्र है कि, उसने बिना लड़े हार मानने से स्पष्ट इनकार तो किया।

इस संदर्भ में 1959 में भारत चीन के प्रथम युद्ध से पहले ही भारत के क्षेत्रों पर किए गए कब्जे का संज्ञान लेना चाहिए।इस संदर्भ में नीचे दिए गए चित्र 1, की लाल रेखा पर ध्यान दें, जो 1959 की भारतीय सीमा के अंदर चीनी नियंत्रण रेखा को दिखाती है। और जिसका उल्लेख चीनी सरकार ने भारत सरकार को भेजे गए चीन की एक तरफा युद्ध विराम संबंधित पत्र में भी किया गया है।       
                         
Chinese claimed line 1959
चित्र 1
(all parameters are approximate and symbolic)
                                   

हमें विशेष रुप से 15 जून 2020 को हमारी  सेना द्वारा चीनी दुस्साहस के प्रति की गई कार्रवाई की विशेष रूप से सराहना करनी चाहिए। देश ने अपने 20 सैनिकों का सर्वोच्च बलिदान देकर अपनी सीमाओं की रक्षा की तथा चीनियों को भारी क्षति पहुंचाई।
 
साथ ही देश के वर्तमान नेतृत्व के द्वारा भी, अपने देश की रक्षा करते हुए, वीरगति को प्राप्त हुए जवानों के बलिदान को, यह कहकर कि, जिस जमीन की आपने रक्षा की है "वहां तो घास का एक तिनका  भी नहीं उगता" व्यर्थ साबित करने का प्रयास नहीं किया गया। तथा चीन के कृत्य का कूटनीतिक और सामरिक दृष्टि से उचित और आक्रामक उत्तर देने का प्रयास किया। इससे हमारे देश की सैनिकों का मनोबल निश्चित तौर पर और बढ़ेगा। हमें यह ध्यान रखना चाहिए की युद्ध सिर्फ हथियारों और सैनिकों के दम पर ही नहीं जीते जाते सैनिकों का मनोबल भी अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

जिस प्रकार देश की सीमाओं के अंदर चीनी सेनाओं के घुसने की खबरें बड़े पैमाने पर प्रचारित और प्रसारित हो रही उससे देश के अंदर एक भ्रम का माहौल बना ही हुआ है यहां पर हमें यह समझने का प्रयास करना चाहिए कि, जो लोग या लोगों का समूह यह प्रचारित व प्रसारित करने का प्रयास कर रहे हैं कि "चीनी सेना ने हमारी सीमा में घुसकर हमारी जमीन पर कब्जा कर लिया है" वे लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष देश का अहित ही कर रहे हैं, जहां वे एक तरफ देश के अंदर चीनी सेनाओं की घुसपैठ की बात करते हैं यह भी कहते हैं की वह जो भी कह रहे हैं वह "अपुष्ट सूत्रों के हवाले से प्राप्त" सूचनाओं के आधार पर कह रहे हैं।

वही 1962 की युद्ध में भारत की पराजय और चीन द्वारा कब्जा की हुई, भारत की जमीन पर कोई भी प्रकाश डालने से बचते नजर आते हैं, तथा यदि गलती से 1962 की बात निकल भी जाए तो "विधवा विलाप" शुरू कर देते है, वे यह बताने में कि, क्या कारण थे, हमारी 1962 की हार के, और चीन द्वारा कब्जाई हुई जमीन को वापस प्राप्त करने के लिए अभी तक क्या क्या प्रयास किए गए।

जिस तरह से भ्रामक स्थितियों का निर्माण किया जा रहा है भ्रामक सूचनाओ द्वारा जोकि वर्तमान सरकार और हमारे सेना के विरोध में ही ज्यादा लगता है। तथा निजी स्वार्थों के वशीभूत होकर किया गया कार्य ही लगता है।

यह एक स्वाभाविक प्रश्न है कि, क्या इस देश में किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह के पास भारत सरकार और भारत की सेना से ज्यादा आधुनिक और विश्वसनीय सूचना तंत्र है। वे सूचनाएं कहां से प्राप्त कर रहे हैं, जिनको आधार बनाकर भारत की सेना के पराक्रम को कलंकित करने का और देश में भ्रम की स्थिति उत्पन्न करने का प्रयास किया जा रहा है। और यदि सूचनाएं "अपुष्ट सूत्रों" से ही मिल रही है तो देश की सेनाओं और देश के प्रधानमंत्री के ऊपर अविश्वास करने की क्या वजह है? 

यह विचारणीय है कि यदि सभी तरफ भ्रामक और अपुष्ट सूचना ही प्रसारित की जा रही हैं, तो क्यों ना हम अपनी सेनाओं और अपने नेतृत्व की बात को सच माने?

15 जून 2020 को की घटनाओं को हम विभिन्न समाचार माध्यमों द्वारा प्रचारित और प्रसारित समाचारों के आधार पर तथा गूगल मैप में "गलवान वैली" की दिखाई गई स्थिति से समझने का प्रयास करेंगे नीचे नीचे दिए गए चित्र में कृपया देखें।


चित्र 2

ऊपर दिखाए गए चित्र 2, में यह लेखक ने यह समझाने का प्रयास किया गया है कि "गलवान वैली" के लगभग सभी हिस्सों (लाल किले के अंदर वाला) पर चीनी सेना ने, नियंत्रण में कर लिया है। चित्र 2, में लेखक ने कथित चीनी कब्जे वाले भारतीय क्षेत्र को "लाल घेरे" में दिखाया है, लेखक स्वयं अपने इस लेख में वर्णन करते हुए, यह कहते हैं कि, यह सूचना "अपुष्ट सूत्रों" के आधार पर प्राप्त हुई है।

चित्र 3, में हम एक पुल को देखेंगे जो कि एक सैटेलाइट इमेज के जरिए हमें दिखाया गया है, यह पुल गलवान नदी के ऊपर और शोक नदी से पूर्व दिशा में भारत ने अपने नियंत्रण वाले ऊपर उल्लेखित "लाल घेरे" वाले क्षेत्र में, 15 जून 2020 को हुई, हिंसक झड़प के बाद, मात्र 72 घंटों में बना लिया।      

चित्र 3

यदि भारतीय सीमा में घुसकर चीनी सेना द्वारा इस क्षेत्र पर नियंत्रण करने की बात में सत्यता होती तो क्या भारतीय सेना गलवान नदी के ऊपर यह पुल बना पाती? जिस पर कि "अपुष्ट सूत्रों से मिली सूचना में" चीन का नियंत्रण बताया जा रहा है।

यह एक विचारणीय प्रश्न है की चीनी सेना अपने नियंत्रण वाले क्षेत्र (यदि लाल घेरे के बारे में किया गया दावा सत्य मान लिया जाए) में भारत को कोई पुल अथवा किसी भी प्रकार का निर्माण क्यों करने देगी?

आइए हम गलवान वैली की भौगोलिक स्थिति को नीचे दिए गए चित्र 4, के माध्यम से समझने का और भ्रम को कम करने का प्रयास करते हैं।
                               
Shyok River
चित्र 4
(all parameters are approximate and symbolic)

चित्र 4, में उत्तर दक्षिण की दिशा में शोक नदी है जो गलवान वैली के पास गलवान नदी से मिलती है, साथ ही भारत के लिए सामरिक महत्व का एक रास्ता "दुरबुक शोक - दौलत बेग ओल्डी रोड" (DSDBO ROAD), शोक नदी के समानांतर दौलत बेग ओल्डी तक जाता है। चित्र 4, में दिखाएं अनुसार लाल रंग का बिंदु "शोक नदी" के किनारे भारतीय सेना का पोस्ट दिखाती है, तथा पीली रेखा (जिसकी लंबाई लगभग 4.6 किलोमीटर है) गलवान नदी के बहाव के रास्ते को, तथा भारतीय सेना के पेट्रोलिंग रूट को, जो कि नियंत्रण रेखा (हरे रंग की रेखा देखें) तक जाता है, और भारतीय सेना द्वारा नियंत्रित क्षेत्र को दर्शाती है।

इसी चित्र 4, में हरे रंग की रेखा नियंत्रण रेखा को दर्शाती है। तथा लाल रेखा चीनी क्षेत्र में चीनी सेना द्वारा उपयोग किए जाने वाला पेट्रोलिंग रूट है, तथा यह भी नियंत्रण रेखा तक आकर खत्म होता है।

चित्र 4, में दर्शाए अनुसार पीली हरी और लाल रेखा का संगम स्थान (पीले बिंदु को देखें ) ही 15 जून 2020 के भारतीय और चीनी सैनिकों के हिंसक संघर्ष का स्थान है। जोकि नियंत्रण रेखा के आस पास ही है।

संघर्ष का तत्कालिक कारण


भारत द्वारा गलवान नदी पर बनाया जा रहा  पुल (जैसा की चित्र 3 और 4, में दिखाया गया है) ही 15 जून 2020 को भारत और चीन की सेना के बीच हिंसक संघर्ष की वजह बना, यह पुल भारत के लिए सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है, इस पुल के बन जाने से भारत के 255KM लंबे, सामरिक महत्व के "दुरबुक श्योक - दौलत बेग ओल्डी रोड" (DSDBO ROAD) की सुरक्षा, और भारतीय सेना के पेट्रोलिंग में सुविधा होगी।

चीनी सेना इस पुल के निर्माण कार्य को रुकवाना चाहती थी, चीनी सेना के विरोध के बावजूद भारतीय सेना ने इस पुल के निर्माण कार्य को जारी रखा, विरोध में चीनी सेना ने नियंत्रण रेखा (LAC) के अत्यंत निकट, अपनी सीमा में एक ऑब्जर्वेशन टावर बनाया, जिसका भारतीय सेना ने विरोध किया और यही विरोध, चित्र 4, में दिखाए गए स्थान पर, भारत और चीन की सेना के बीच हिंसक संघर्ष की वजह बना, जिसमें भारत के 20 सैनिकों को वीरगति की प्राप्ति हुई, और भारी संख्या में चीन के सैनिक हताहत हुए यह ध्यान देने योग्य बात है, कि 15 जून 2020 के बाद भारतीय सेना ने 72 घंटों के अंदर इस चित्र में दिखाए गए पुल का निर्माण कार्य संपन्न कर लिया।

इस बात का मिथ्या प्रचार, कि यह क्षेत्र चीनी सेना के नियंत्रण में है, का कोई औचित्य नजर आता नहीं है, अन्यथा गलवान नदी के ऊपर भारतीय सेना द्वारा बनाए गए इस पुल का अस्तित्व होना ही संभव नहीं होता, यह तो सामान्य बुद्धिमत्ता से समझे जाने वाली बात है, इसके लिए किसी का "Albert Einstein" होना जरूरी नहीं।

भारत द्वारा अभी तक, उपेक्षित, इस क्षेत्र में सामरिक एवं नागरिक महत्व के निर्माण कार्यों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। यही निर्माण कार्य चीनी सरकार की आंखों की किरकिरी बने हुए हैं।

यहां यह समझने की आवश्यकता है कि, भारत के अभी तक के इस उपेक्षित क्षेत्र में किए जा रहे, निर्माण कार्य चीन के लिए अत्यंत चिंता का विषय बने हुए हैं। इन निर्माण कार्यों के पूरा हो जाने की वजह से चीन द्वारा अभी तक इस क्षेत्र में जो आक्रामकता का परिचय दिया है, उस पर नियंत्रण किया जा सकेगा तथा चीन की विस्तार वादी नीतियों पर निगरानी और नियंत्रण किया जा सकेगा सेनाओं और नागरिकों के आवागमन के लिए यह निर्माण कार्य अत्यंत आवश्यक है जिनका अभाव 1962 की पराजय के बहुत से कारणों में से एक है।

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